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देश आज कारगिल पर विजय की 20वीं वर्षगांठ मना रहा है। 1999 में आज ही के दिन भारत के वीर सपूतों ने कारगिल की चोटियों से पाकिस्तानी फौज को खदेड़कर तिरंगा फहराया था। हालांकि इस जंग में हमने कई बहादुर जवान खोए, इन्ही में एक थे सुराना गांव के सुरेन्द्र्र ंसह यादव। उनकी शहादत ने ऐसी प्रेरणा दी कि सुराना और पड़ोस के सुठारी गांव के 150 से ज्यादा लोग सेना का हिस्सा बन गए। ग्राम प्रधान मोनिका यादव बताती हैं कि जहां आजादी के बाद पांच दशक में करीब 80 लोग सेना का हिस्सा थे तो वहीं, कारगिल फतह के बाद 150 से अधिक युवा सेना में भर्ती हुए।
बुजुर्ग महावीर सिंह बताते हैं कि गांव की दो बेटियां सेना में, आठ बहू और बेटियां अर्धसैनिक बलों में एवं 35 बेटियां पुलिस सेवा में कार्यरत हैं। कारगिल जंग से पहले कोई बहू या बेटी सेना या दूसरे बलों में नहीं थीं।
शपथ ली थी 
सुराना गांव के राकेश कुमार ने बताया कि जब सुरेन्द्र यादव का पार्थिव शरीर गांव पहुंचा तो हजारों लोग उन्हें सलामी देने पहुंचे थे। अंतिम संस्कार से पहले 100 से ज्यादा युवाओं ने शपथ ली थी कि वे सेना में जाकर इसका बदला लेंगे। 
फोटो लेकर सोती हैं मां
सुरेंद्र के भाई वीरेन्द्र ने बताया कि मां चंपा देवी रात को भाई की फोटो साथ लेकर सोती हैं। उठते ही फोटो निहारती हैं। वे भी जब किसी सैनिक को देखते हैं तो भाई याद आ जाते हैं।
पहली तैनाती थी
सुरेन्द्र 20 साल की उम्र में 1997 में सेना में भर्ती हुए। कश्मीर में पहली तैनाती मिली। जंग के दौरान उनकी कुमाऊं रेजीमेंट ने टाइगर हिल चोटी मुक्त करा ली पर सुरेंद्र शहीद हो गए।


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